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नई रचनाओं में—
उम्र आधी हो चली है
ऐसा लगता है

क्या हुआ
मुकद्दर उसके जैसा

अंजुमन में—
झुलसता देखकर
न इसकी थाह है
नदी
नसीबों पर नहीं चलते
ना उम्मीदी में
पेड़ कटे तो
वहाँ पर
समंदर
हज़ारों बार गिरना है
हमारे ख्वाब की दुनिया

दोहों में—
छे दोहे

हाइकु में—
आठ हाइकु
होली हाइकु

  हमारे ख्व़ाब की दुनिया

हमारे ख्व़ाब की दुनिया, हमारी आस की दुनिया
चुरा सकता नहीं हमसे कोई एहसास की दुनिया।

गम़ों पर मुस्कराती है, खुशी पर खुश नहीं होती
समझ में ही नहीं आती, हमारे पास की दुनिया।

बनाने में लगे बरसों, मिटाने में लगे पल भर
अजब ही शै हुआ करती ये विश्वास की दुनिया।

कई सच पूर्व जन्मों के, कई सच बाद के होंगे
हमारा सच मगर है यह हमारी श्वास की दुनिया।

न कम होती है पीने से, न प्यासा ही रहा जाए
जहाँ भी है, वहीं पर है मुसल्सल प्यार की दुनिया।

१ मई २००५

 

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