अंजुमनउपहारकाव्य संगमगीतगौरव ग्राम गौरवग्रंथ
दोहे पुराने अंकसंकलनहाइकुहास्य व्यंग्यक्षणिकाएँदिशांतर

अनुभूति में मधुलता अरोरा की रचनाएँ-

नई रचनाओं में-
अकेली कहाँ हूँ?
अच्छा है ये मौन हैं
काश मैं बच्चा होती
पता नहीं चलता
मेरे अपने

महिला दिवस पर विशेष
नारी

छंदमुक्त में-
अकेलापन
जादूगर बसन्त
झूठ तो झूठ है
पत्नी
मानदंड
मोबाइल महिमा
रिश्ते हैं ज़िंदगी
वाह! क्या बात है

संकलन में-
दिये जलाओ- दीपोत्सव
मौसम- ओ मौसम

 

काश मैं बच्चा होती

किसने रखा मेरा नाम दहलीज
कुछ पता नहीं यह राज
बस पता है तो इतना कि मैं हूँ घर की
लक्ष्मण रेखा
मुझे लाँघने से जुड़ी है
घर की इज्ज़त और हया
मुझे पता हैं घर के सारे भेद
सबके झगड़े, प्यार, मुहब्बत
जब छोटे बच्चे मुझे लाँघकर खेलते हैं
लुका-छिपी का खेल
दिल हो जाता है बाग-बाग
मचलता है बार-बार
काश मैं बच्चा होती
उन जैसी झगड़े- टंटों रहती कोसों दूर
उनके सपनों की दुनिया में
दूध-पानी सी घुल-मिल जाती

२३ मई २०११
 

इस रचना पर अपने विचार लिखें    दूसरों के विचार पढ़ें 

अंजुमनउपहारकाव्य चर्चाकाव्य संगमकिशोर कोनागौरव ग्राम गौरवग्रंथदोहेरचनाएँ भेजें
नई हवा पाठकनामा पुराने अंक संकलन हाइकु हास्य व्यंग्य क्षणिकाएँ दिशांतर समस्यापूर्ति

© सर्वाधिकार सुरक्षित
अनुभूति व्यक्तिगत अभिरुचि की अव्यवसायिक साहित्यिक पत्रिका है। इसमें प्रकाशित सभी रचनाओं के सर्वाधिकार संबंधित लेखकों अथवा प्रकाशकों के पास सुरक्षित हैं। लेखक अथवा प्रकाशक की लिखित स्वीकृति के बिना इनके किसी भी अंश के पुनर्प्रकाशन की अनुमति नहीं है। यह पत्रिका प्रत्येक सोमवार को परिवर्धित होती है

hit counter