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अनुभूति में प्रदीप मिश्र की रचनाएँ

कविताओं में-
तुम नहीं हो शहर में
कनुप्रिया
ज़िन्दा रहने के लिये
दुख जब पिघलता है
पहाड़ी नदी की तरह
पायदान पर
फिर कभी
फिर तान कर सोएगा
फूलों को इंतज़ार है
महानगर
मेरे समय का फलसफा
मैं और तुम
वायरस

स्कूटर चलाती हुई लड़कियाँ
सफेद कबूतर

डूबते हुए हरसूद पर-
एक दिन
जब भी कोई जाता
पाकिस्तान से विस्थापित
फैली थी महामारी
बढ़ रहा है नदी में पानी
सुनसान सड़क पर

संकलन में
नया साल- यह सुबह तुम्हारी है

  तुम नहीं हो शहर में
(कवि मित्र अरुभ आदित्य के लिए)

जैसे सूरज डूबने के बाद
बची रहती है रौशनी
पतझड़ में हरापन
बुरे समय में सपने
बुझी अंगीठी में ऊष्मा
तुम्हारे शब्द बचे हुए हैं
हमारे पास

बची हुई हैं तुम्हारी बातें
जिनकी चर्चा में रजनी रमण
इस तरह मशगूल होते हैं
जैसे अभी-अभी लौटे हों
तुमसे मिलकर

अपनी ग़ज़लों को सुनाते हुए प्रदीप कांत
तुम्हारी सलाहों को सहेज रहता हैं

देवेंद्र फोन पर बताता है
कि अभी-अभी वसुधा में पढ़ी है
तुम्हारी कविताएँ

हमारे पास
तुम्हारा इतना कुछ जीवित है
फिर कैसे कोई माने कि
वर्षों से तुम नहीं हो इस शहर में।

२४ जनवरी २००६

 

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