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अनुभूति में प्रदीप मिश्र की रचनाएँ

कविताओं में-
तुम नहीं हो शहर में
कनुप्रिया
ज़िन्दा रहने के लिये
दुख जब पिघलता है
पहाड़ी नदी की तरह
पायदान पर
फिर कभी
फिर तान कर सोएगा
फूलों को इंतज़ार है
महानगर
मेरे समय का फलसफा
मैं और तुम
वायरस

स्कूटर चलाती हुई लड़कियाँ
सफेद कबूतर

डूबते हुए हरसूद पर-
एक दिन
जब भी कोई जाता
पाकिस्तान से विस्थापित
फैली थी महामारी
बढ़ रहा है नदी में पानी
सुनसान सड़क पर

संकलन में
नया साल- यह सुबह तुम्हारी है

  जिन्दा रहने के लिए

किसी मज़दूर के घर
शाम को बनती हुई
मोटी रोटियों के प्रति
उसके दिन भर के भूखे
बच्चे की चाह की तरह
मैं चाहता हूँ
तुम्हें।

धान और गेंहूँ के साथ-साथ
तुमको भी रोपकर
अपने खेत में
मैं जता देना चाहता हूँ लोगों को
कि तुम भी
रोटी की तरह ज़रूरी हो
ज़िन्दा रहने के लिए।

 

 

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