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प्रश्न

मैं भी तुम्हारी तरह
सुबह से शाम तक खटती,
देखती कई उतार-चढ़ाव,
सहती अनगिनत अप्रिय शब्द,
लौटती घर पूरी तरह
निचोड़ी गई किसी चूनरी की तरह,
पर शायद तुम ज़्यादा थक जाते,
निच्छावर करती संपूर्ण अस्तित्व
तुम्हें खुश रखने हेतू,
बनना चाहती अच्छी माँ, पत्नि, बहन,
एक अच्छी व्यवसायिका भी,
परंतु एक सवाल सदैव झंझोड़ता
कि तुम मुझसे ज़्यादा क्यों थकते हो,
शायद समाज का बोझ तुम पर ज़्यादा है,
और तुम अबला कह कर, मुझे
कितनी सबला बना, पीस जाते हो
समाज की लोह चक्की में।

24 अप्रैल 2007

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