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अनुभूति में सुनीता ठाकुर की रचनाएँ

औरत के क्षितिज से
अपने हक़ के लिए
ठहरा हुआ पानी
धरती की कोख में
प्रयास

 

अपने हक़ के लिए

अपने हक़ के लिए
लड़ती,
रौंदती-हक़ उम्र के।
उम्र थी-
सवालों से घिरी
अपने लिए
सुकून के दो पल तलाशती
उम्र की ढलान पर
बेतहाशा दौड़ती ज़िंदगी
को संभालती
सहारा ढूँढ़ती-सहारा बनती।

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