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अनुभूति में सुनीता ठाकुर की रचनाएँ

औरत के क्षितिज से
अपने हक़ के लिए
ठहरा हुआ पानी
धरती की कोख में
प्रयास

 

धरती की कोख में

धरती की कोख में
रोपकर एक बीज
हम माँगेंगे आकाश से
एक बूँद
एक दाना ऐसा जो भर सके करोड़ों का पेट
भरपेट।
जो हो अपना
जिसके गर्भ से
आती हो
मिट्टी की गंध अपनी-सी।

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