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अनुभूति में सुनीता ठाकुर की रचनाएँ

औरत के क्षितिज से
अपने हक़ के लिए
ठहरा हुआ पानी
धरती की कोख में
प्रयास

 

 

औरत के क्षितिज से

औरत के क्षितिज से
आँचल में
चाँद-सी बिंदिया
झिलमिलाती है।
नदिया-सी
इठलाती है ज़िंदगी
उसकी रोटियों में बिलता है
श्रम ज़िंदगी का
वह भरपेट सोती
अपनी दुनिया को देखती है
उसका चाँद
और भी मुखर हो उठता है
औरत नियति-सी
ख़ामोश है
निहारती प्रारब्ध को।

16 मार्च 2007

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