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अनुभूति में सुनीता ठाकुर की रचनाएँ

औरत के क्षितिज से
अपने हक़ के लिए
ठहरा हुआ पानी
धरती की कोख में
प्रयास

 

ठहरा हुआ पानी

ठहरा हुआ पानी
मैं और तुम
फ़ुरसत के दो पल
और आइसक्रीम के साथ
साँस दर साँस
सुलगते।
पिघलते जज़्बात
एक मौन
या कि
थिरकता हुआ रोमांस
ज़िंदगी को
और क्या चाहिए।

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