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पाँच छोटी कविताएँ

 

औघड़

आस्था के
अगाध प्रवाह का साक्षी,
भभूतिया बदन बिंबित करता प्रेम

कमल का कीचड़ से
झरनो का पहाड़ो से
हंसो का नदिया से !

क्षिप्रा-सा शांत अंतस
निमग्न अपने ही
धुन की धुकधुकी मे !

नहीं चाहता,
माया से निर्लिप्त
शून्य-सा चित
समेटना काया को
लिप्सा- अभीप्सा
दृष्ट-अदृष्ट
के फेर मे !

ज्ञात ही तो हैं
उस औघड़ को
काल-दर्शन का महासूत्र
इक ॐकार.......!


२ जनवरी २०११

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