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दो कबूतर
बचपन

छोटी कविताओं में-
पाँच छोटी कविताएँ

  बचपन

बाद मुद्दतों के
फिर इक रोज़
बनाई थी , किश्तियाँ कागज की !
हर नज़र नन्ही मुस्कुराहटों का लिबास ओढ़े
बूढ़े दरख्त मानो फिर से जवां हो गए ,
और जिस्म कतरा-कतरा
बिखर घुलता गया
खुशनुमा मंज़र की
रंगिनियों में..।

वो वक़्त
रोज़ गुजरने वाले वक़्त सा नहीं था
वो वक़्त.. जो कई सालों
पहले गुजर चुका था
उसका बचपन था ,
मेरा बचपन था ,
जो लौटा था फिर से
बस इतना कहने, में ज़िंदा हूँ.....!
फिर….!
फिर वही रात
फिर वही खामोशी
फिर निकला चाँद
फिर सूर्य ने की खुदखुशी

फिर गली-कूंचो ने लपेटा काला लिबास
फिर दिन के भटके पंछी को
ठिकाने की तलाश
फिर कतरा-कतरा चाँद बिखरता-सा
फिर नभ सितारों से भरता-सा
फिर धीमे-धीमे रात डूबती गहन निद्रा में
और फिर...
क्षितिज पार आविर्भाव
महामेध-ओजस्वी ,अरुणसारथी का
फिर सब कुछ पुनः वैसा
फिर से पहले जैसा.....!

२ जनवरी २०११

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