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आप चुप क्यों हैं?

रात अपने उम्र के
अंतिम पड़ाव पर है
मैं जुटा हूँ सहेजने में
डायरी के पन्नों को
वैसे ही जैसे कोई बच्चा
सहेजता है खिलौने को
खेलने के बाद

सहसा वर्षों पहले की कविता
मेरे सामने आ जाती है
जिसे लिखा था मैंने
एक गुलाब की कली को
धूप में झुलसते देखकर
वह कविता नहीं थी
सपनीली आँखों वाली
मेरी बेटी थी
जिसकी किलकारियाँ
जब मन्दिर में गूँज जाती
तो आरती हो जाती
और मस्जिद में तो अजान
उसके हर्षित स्वर पर
आकाश हँस देता
और पृथ्वी मुसकरा कर
आकाश के सिरहाने बैठ जाती
नाम उसका आप जो चाहे रख लें
मीना सकीना कुछ भी
लेकिन थी मेरी बेटी

एक दिन मेरी बेटी
चली गई
कविता से निकलकर
दिन घोड़ों की तरह सरपट भागता रहा
पर बेटी वापस नहीं आई
वह होती तो
आज मंदिर का गुम्बज नहीं चाहता
मस्जिद की ऊँचाई पार करना
और मस्जिद की मीनारें
नहीं लगाती तिकड़म
गुम्बज तोड़ने का
शायद दोनों चाहते हैं आकाश को छूना
पर आकाश तो घबराकर
दुबक चुका है एक कोने मे
उसे कोई छू सकता है तो मेरी बेटी
मेरी अँगुलियाँ पन्ने पर फिसलती
महसूस करती हैं अक्षरों को
एक-एक कर सारे अक्षर
अपनी जमीन छोड़ते जाते हैं
और आपस में गड्मड् हो
तब्दील होने लगते हैं
मानवीय आकृति में
मैं आश्चर्यचकित
निहारता हूँ
साफ-साफ झलकने लगता है
चेहरा मेरी बेटी का
शायद जाग पड़ी है वह
मेरे प्यार भरे स्पर्श से

मैं काँप उठता हूँ
बेटी की आँखें सूजी हुई हैं
सफेद हो चुके हैं उसके होंठ
शरीर पर पसरे हैं
पुराने जख्मों के निशान
तो ताजा हैं अभी
नये जख्म भी हरापन लिये
जो सबूत हैं उसकी कैद का
जिसे भोगा है उसने
अबतक आजादी के बाद से
उसके बदन पर छपे
भिन्न-भिन्न चिह्नों के निशान
हस्ताक्षर हैं
अपहरणकर्त्ताओं के
जिसे देखा जाता है चुनाव के वक्त
इवीएम बॉक्स पर उगी
आकृतियों के रूप में

मैं हैरान हूँ
अपनी बेटी की बेबसी पर
परन्तु आप चुप क्यों हैं?
मैं स्तब्ध हूँ
आपकी खामोशी पर।

१२ मई २०१४

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