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चिठ्ठियाँ

महीने दो महीने में
एक बार ज़रूर आती थी
बाबूजी की चिठ्ठी
चिठ्ठी खोलते ही
महक उठता था
गाँव की सोंधी मिट्टी
हर अक्षर में दिखाई पड़ता था
बाबूजी का चेहरा
हर शब्द
बाबूजी की हथेलियों की तरह
मेरी पीठ पर थपकियाँ लगाते
देता था संबल
यह महज़ चिठ्ठी नहीं होता
स्वयं बाबूजी होते
जो अपने वजूद को
शब्दों में पिरोकर
उपस्थित होते थे मेरे सामने
अब न बाबूजी रहे
न चिठ्ठियाँ
मिट्टी का सोंधापन भी
बदल गया है ऊसर में
तालाब के पानी में मिल गया है
तेजाब वर्चस्व का
नाते–रिश्तेदारों ने बना ली है
दूसरी दुनिया
अपनी–अपनी परिधि में
पीपल के पेड़ के नीचे
अब नहीं होती कोई बैठक
क्योंकि वहाँ खड़ा है मोबाइल का टावर
इन सब के बावजूद
चिठ्ठियाँ आती है
सुखद संदेशों के साथ
परंतु
बाबूजी के चेहरे की तरह
नहीं दिखता
लिखने वाले का चेहरा।

१६ नवंबर २००५

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