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  इश्क

कफन में लिपटा बादलों के
छुपता सूरज
अँधेरी क़ब्र में सो चुका था
न जाने कब से
अपने आप से रूठा सूरज

एक आग के दरिया में
बहते किनारे उफ़क के
न जाने जलते रहे किसके लिए
दिन के ढल जाने तक

कौन था यह?
न जाने कबसे
खड़ा था जो सामने बाहें पसारे
पौ के फटने और भोर के हो जाने तक!
कब्र के फटने और कफ़न के उड़ जाने तक!

ओस की बूँद में बैठा छिपकर साँसे लेता
इश्क का कोई टूटा हुआ
टुकड़ा है शायद
किसी बिसरे हुए गीत का
कोई भटका हुआ
मुखड़ा है शायद!

२५ जनवरी २०१०

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