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अनुभूति में शशि पाधा की रचनाएँ

नए गीतों में-
कैसे बीनूँ, कहाँ सहेजूँ
चलूँ अनंत की ओर
मन की बात
मैली हो गई धूप

गीतों में-
आश्वासन
क्यों पीड़ा हो गई जीवन धन
पाती
बस तेरे लिए

मन रे कोई गीत गा
मौन का सागर
लौट आया मधुमास

संधिकाल

संकलनों में-
फूले कदंब- फूल कदंब

होली है- कैसे खेलें आज होली
नववर्ष अभिनंदन- नव वर्ष आया है द्वार
वसंती हवा- वसंतागमन

नवगीत की पाठशाला में-
कैसे बीनूँ
गर्मी के दिन

मन की बात

 

 

  मै चली तो जग चला

मैं चली तो जग चला, संग चली तक़दीर
बहती नदिया कह गई, रुकूँ तो गंदला नीर।

मन में द्वेष न पालिए, मन ही मैला होय
गुर मिश्री जग बाँटिए, हाथ भी मीठा होय।

अन्तर्मन में झाँकिए, खुद की कर पहचान
धुँधले दर्पण में दिखे, सूरत इक अनजान।

रंग मंच यह लोक है, बहुरंगी हैं लोग
प्रेम रंग जो जान ले, कोई न लागे रोग।

अधजल गगरी ले चली, गोरी अपने गाँव
न प्यासे की प्यास बुझी, व्यर्थ थकाए पाँव।

परमारथ के काज में, गिनो नहीं दो चार
कण-कण धरती सींचने, बहती नदिया धार।

तन का कैदी मन रहे, मन का कैदी मोह
पिंजरा खोल के देखिए, छूटे राग विछोह।

धन से झोली क्यों भरे, धन चिंता जंजाल
पंछी चोंच न भर सके, भरे तलैया ताल।

यह जग फूलों से भरा, नभ में हैं सत रंग
चुन लो तो डलिया भरे, खुशबू भीगे अंग।

२८ सितंबर २००९

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अनुभूति व्यक्तिगत अभिरुचि की अव्यवसायिक साहित्यिक पत्रिका है। इसमें प्रकाशित सभी रचनाओं के सर्वाधिकार संबंधित लेखकों अथवा प्रकाशकों के पास सुरक्षित हैं। लेखक अथवा प्रकाशक की लिखित स्वीकृति के बिना इनके किसी भी अंश के पुनर्प्रकाशन की अनुमति नहीं है। यह पत्रिका प्रत्येक सोमवार को परिवर्धित होती है

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