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हँसना-रोना

जो रोया
सो आँसुओं के दलदल में
धँस गया,
और कहते हैं
जो हँस गया वो फँस गया।
अगर फँस गया
तो मुहावरा आगे बढ़ता है
कि जो हँस गया,
उसका घर बस गया।
मुहावरा फिर आगे बढ़ता है
जिसका घर बस गया,
वो फँस गया!

और जो फँस गया,
वो आँसुओं के दलदल में
धँस गया!!

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अनुभूति व्यक्तिगत अभिरुचि की अव्यवसायिक साहित्यिक पत्रिका है। इस में प्रकाशित सभी रचनाओं के सर्वाधिकार संबंधित लेखकों अथवा प्रकाशकों के पास सुरक्षित हैं। लेखक अथवा प्रकाशक की लिखित स्वीकृति के बिना इनके किसी भी अंश के पुनर्प्रकाशन की अनुमति नहीं है। यह पत्रिका प्रत्येक माह की 1–9 –16 तथा 24 तारीख को परिवर्धित होती है।