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अनुभूति में सुदेषणा रूहान की रचनाएँ-

छंदमुक्त में-
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परिक्रमा
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सत्य

 

सत्य

सत्य तुम जय में नहीं,
पराजय में नहीं,
यश में नहीं,
अपयश में नहीं,
शब्द में नहीं,
मौन में नहीं,
तुम हो केवल आत्मसात
हथेलियों में।
मेरे कर्म में।

मैंने अपनी शिराओं
में दौड़ते देखा है तुम्हें।
और कुछ अलौकिक नहीं था उस भोर
जब तुम मुझे छू कर गए थे,
पर-पुरूष की भांति।
न देखा किसी और ने।
मैंने केवल इतना कहा,
"जीवन-समय के साथ तुम फिर आओगे"

और अंत में
सत्य,
इस बार मैं नहीं,
तुम मुझे ढूँढना।

३ जून २०१३

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