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पतंग की डोर

एक डोर से बँधी मैं,
पतंग बन गई
दूर-बहुत-दूर. . .
आकाश की ऊँचाइयों को नापने,
सपनों की दुनिया में,
उड़ती रही. . . इस ओर कभी उस ओर
कभी डगमगाई कभी सम्हली
फिर उड़ी एक नई आशा के साथ,
इस बार पार कर ही लूँगी
वृहत आकाश
पा ही लूँगी मेरा सपना
मगर तभी, झटका-सा लगा. . .
एक अनजानी आशंका,
मुड़कर देखा
वो डोर जिससे बँधी थी
वो डोर जो मज़बूत थी
बिलकुल मेरे उसूलों
मेरे दायरों की तरह

फिर सोचा
तोड़ दूँ इस डोर को
आख़िर कब तक बँधी रहूँगी
इन बेड़ियों में
जो उड़ने से रोकती हैं
कि सहसा एक आह सुनी
डोर तोड़ कर गिरी
एक कटी पतंग की
जो अपना संतुलन खो बैठी
लूट रहे थे हज़ारों हाथ
कभी इधर, कभी उधर
अचानक
नोच लिया उसको
सभी क्रूर हाथों ने
कराह आई
काश! डोर से बँधी होती
किसी सम्मानित हाथों में
पूरा न सही
होता मेरा भी अपना आकाश
और मैं लौट गई
चरखी में लिपट गई
डोर के साथ

9 जुलाई 2007

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