अंजुमनउपहार कविकाव्य चर्चाकाव्य संगमकिशोर कोनागौरव ग्राम
गौरवग्रंथ दोहेरचनाएँ भेजेंनई हवा पाठकनामा पुराने अंकसंकलन
हाइकु हास्य व्यंग्यक्षणिकाएँदिशांतरसमस्यापूर्ति

 

अनुभूति में सुनीता शानू की रचनाएँ-

नई रचनाएँ-
तो फिर प्यार कहाँ है
विचारों की शृंखला

कविताओं में-
दर्द का रिश्ता
पतंग की डोर
मेरी माँ
ऐ दोस्त

 

पतंग की डोर

एक डोर से बँधी मैं,
पतंग बन गई
दूर-बहुत-दूर. . .
आकाश की ऊँचाइयों को नापने,
सपनों की दुनिया में,
उड़ती रही. . . इस ओर कभी उस ओर
कभी डगमगाई कभी सम्हली
फिर उड़ी एक नई आशा के साथ,
इस बार पार कर ही लूँगी
वृहत आकाश
पा ही लूँगी मेरा सपना
मगर तभी, झटका-सा लगा. . .
एक अनजानी आशंका,
मुड़कर देखा
वो डोर जिससे बँधी थी
वो डोर जो मज़बूत थी
बिलकुल मेरे उसूलों
मेरे दायरों की तरह

फिर सोचा
तोड़ दूँ इस डोर को
आख़िर कब तक बँधी रहूँगी
इन बेड़ियों में
जो उड़ने से रोकती हैं
कि सहसा एक आह सुनी
डोर तोड़ कर गिरी
एक कटी पतंग की
जो अपना संतुलन खो बैठी
लूट रहे थे हज़ारों हाथ
कभी इधर, कभी उधर
अचानक
नोच लिया उसको
सभी क्रूर हाथों ने
कराह आई
काश! डोर से बँधी होती
किसी सम्मानित हाथों में
पूरा न सही
होता मेरा भी अपना आकाश
और मैं लौट गई
चरखी में लिपट गई
डोर के साथ

9 जुलाई 2007

इस कविता पर अपने विचार लिखें    दूसरों के विचार पढ़ें 

अंजुमनउपहारकविकाव्य चर्चाकाव्य संगमकिशोर कोनागौरव ग्रामगौरवग्रंथदोहेरचनाएँ भेजें
नई हवा पाठकनामा पुराने अंक संकलनहाइकुहास्य व्यंग्यक्षणिकाएँ दिशांतरसमस्यापूर्ति

© सर्वाधिकार सुरक्षित
अनुभूति व्यक्तिगत अभिरुचि की अव्यवसायिक साहित्यिक पत्रिका है। इस में प्रकाशित सभी रचनाओं के सर्वाधिकार संबंधित लेखकों अथवा प्रकाशकों के पास सुरक्षित हैं। लेखक अथवा प्रकाशक की लिखित स्वीकृति के बिना इनके किसी भी अंश के पुनर्प्रकाशन की अनुमति नहीं है। यह पत्रिका प्रत्येक माह की 1–9 –16 तथा 24 तारीख को परिवर्धित होती है।