अंजुमनउपहारकाव्य संगमगीतगौरव ग्राम गौरवग्रंथदोहे पुराने अंक संकलनअभिव्यक्ति कुण्डलियाहाइकुहास्य व्यंग्यक्षणिकाएँदिशांतर

अनुभूति में अरुण मित्तल अद्भुत की रचनाएँ-

नई रचनाएँ-
उलझे उलझे अपने रिश्ते
ऊपर से सख़्तजान
तय सफ़र कुछ यों भी करना
देख सारे हिसाब
मुझमें इतने खोए आँसू
रौशनी का जब कभी आभास
वो धोखा दे गया

अंजुमन में--
अंधेरों में चमकता
कौन समझेगा
खुद से मिलकर
जो उजालों मे
तुम्हें झूठ से बहलाने में
सिर्फ और सिर्फ

हिसाब मत देना
 

 

खुद से मिलकर

खुद से मिलकर हो रही है आज हैरानी बहुत
मन नहीं लगता कहीं भी है परेशानी बहुत

झेलने की दर्दो गम को और गुंजाइश नहीं
सह चुका है मन मेरा दुनिया की मनमानी बहुत

चाहता हूं मैं तड़प के साथ अश्कों की नमी
यूँ तो बारिश में भी गिरता है यहाँ पानी बहुत

वो हसीं देखे हुए तो एक मुद्दत हो गई
लग रही है मुस्कुराहट भी ये अनजानी बहुत

जाने क्यों आँखों से आँसू बहने को बेताब हैं
धड़कनें किस बात की खातिर हैं दीवानी बहुत

मेरे कहते ही ये मंजर सब समझ जाओगे तुम
पर है मुश्किल बात ये मुश्किल है कह पानी बहुत

ठीक है अद्भुत जिया है तूने ग़ज़लों का हुनर
पर तेरे अशआर में है अब भी नादानी बहुत

जनवरी २००८

इस रचना पर अपने विचार लिखें    दूसरों के विचार पढ़ें 

अंजुमनउपहारकाव्य चर्चाकाव्य संगमकिशोर कोनागौरव ग्राम गौरवग्रंथदोहेरचनाएँ भेजें
नई हवा पाठकनामा पुराने अंक संकलन हाइकु हास्य व्यंग्य क्षणिकाएँ दिशांतर समस्यापूर्ति

© सर्वाधिकार सुरक्षित
अनुभूति व्यक्तिगत अभिरुचि की अव्यवसायिक साहित्यिक पत्रिका है। इसमें प्रकाशित सभी रचनाओं के सर्वाधिकार संबंधित लेखकों अथवा प्रकाशकों के पास सुरक्षित हैं। लेखक अथवा प्रकाशक की लिखित स्वीकृति के बिना इनके किसी भी अंश के पुनर्प्रकाशन की अनुमति नहीं है। यह पत्रिका प्रत्येक सोमवार को परिवर्धित होती है

hit counter