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नयी रचनाओं में-
दुबारा वतन
नहीं गिरता
नहीं थी फिर तमन्ना
बात बिगड़ी जो बनाऊँ
शोलों से खेलना

छंदमुक्त में-
ऊँचाई
घर
जलस्तर
थकन
वन देवता

हाइकु में-
बारह हाइकु मौसम के नाम

गीतों में-
चंदा मामा रहो न अब यों
चलना पथ पाना है

तटबन्धों-का टूटना
मन की पहरेदारी में

मेघ से कह दो

अंजुमन में-
टूटे-फूटे घर में
फ़ुर्सत मिले तो
बिना मौसम
शहर में

संकलन में-
नयनन में नंदलाल- प्रभुकुंज बिहारी
नया साल- नया क्या साल में है
ममतामयी- जय अम्बिके
विजयपर्वी- आशाएँ फलने को विजयपर्व कहता चल
         पिंजरे का तोता
होली है- फागुन की पहली पगचाप

हरसिंगार- मन हरसिंगार

  नहीं गिरता

फेंका हुआ तेरा कहीं पत्थर नहीं गिरता
इस नेक निशाने में मेरा घर नहीं गिरता

आशिक़ हूँ तुझे चाहता रहता हूँ हमेशा
ठोकर से बचूँ तो मैं कहीं पर नहीं गिरता

है आज तमाशा, दिखेगा शहर में जोरों
लटका हुआ रस्सी भला जो'कर नहीं गिरता

हिस्से लिखी मेरी कहीं नाकामियाँ तो क्या
आसान सफर में क्या समुद्र नहीं गिरता

माप रखा करते हैं अपनी ही बुलंदी
अहसास में ज़िंदा कोई शायर नहीं गिरता

१ जुलाई २०२५

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