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24. 4. 2007  

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कुछ कहीं हो जाए

कुछ कहीं हो जाए,
यह संभावनाओं का शहर है।

रात के आग़ोश में
सो जाए सूरज, बहुत मुमकिन,
एक प्याली चाय में
खो जाए सूरज बहुत मुमकिन

कुछ न पूछो
यह नई परिकल्पनाओं का शहर है।

लाख बचकर आप निकलें
चोट लगकर ही रहेगी,
और इस पर आप को ही
भीड़ अपराधी कहेगी।

हों नहीं हैरान
यह सनकी हवाओं का शहर है।

भूलकर भी दो गुने दो चार
अब होता नहीं है
सत्य को इतना खरा
आधार अब होता नहीं है

झूठ के हैं पाँव,
यह प्रेतात्माओं का शहर है।

– डॉ राधेश्याम शुक्ल

 

इस सप्ताह

गीतों में-
डॉ राधेश्याम शुक्ल

कविताओं में-
शबनम शर्मा

विविध विधाओं में-
गिरीश बिल्लोरे ''मुकुल''

दिशांतर में-
सुरेश राय

पिछले सप्ताह

स माह के कवि-
ममता किरण

गीत और ग़ज़ल में-
डॉ. अजय पाठक, संजय ग्रोवर, डॉ राम सनेही लाल शर्मा 'यायावर', अचला दीप्ति कुमार

दोहों में-
डॉ. गोपाल बाबू शर्मा

काव्य संगम में-
बशीर अतहर

हास्य व्यंग्य मे-
चक्रधर शुक्ल

मुक्तक में-
सुनील जोगी

विताओं में-
मथुरा कलौनी, रमेश देवमणि, आशुतोष दुबे

देशांतर में-
यू.ए.ई. से चंद्र मोहन भंडारी और यू एस ए से अंजना संधीर

नई हवा में-
विक्रांत, शांतनु गोयल और शशि भूषण

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