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अभिव्यक्ति तुक-कोश

१. ३. २०१९

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फागुन आ गया है

 

 

हल्दिया सुबहें हुई हैं कुमकुमी हैं शाम
फागुन आ गया है
आ गई लेकर हवाएँ मौसमी पैगाम
फागुन आ गया है

बाँध कर फिर सप्तरंगी स्वप्न आँचल में
कर रही स्नान किरणें झील के जल में
केश खोले धूप तट पर
कर रही विश्राम
फागुन आ गया है

उड़ रहे हैं चहचहाते पंछियों के दल
प्रीति के फिर गीत मीठे गा रही कोयल
झूमता महुआ खुशी से
मुस्कुराता आम
फागुन आ गया है

कल्पनाओं ने क्षितिज के छोर हैं लाँघे
बुन रहे अनुबंध मन के रेशमी धागे
लिख रहे हैं चिट्ठियाँ
भौरें कली के नाम
फागुन आ गया है

फूलती सरसों दहकते हैं पलाशी वन
अमिलताशी गंध में खोने लगा तन -मन
रच दिये मौसम ने रंगों के
विविध आयाम
फागुन आ गया है

ढोलके संगीत फगुआ खेलती टोली
याद आई गाँव की रंगों भरी होली
लौट आये दिन वो
सुधियों की उँगलियाँ थाम
फागुन आ गया है

- मधु शुक्ला

इस माह
होली विशेषांक में

गीतों में-

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अमिताभ त्रिपाठी

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आचार्य श्रीधर शील

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ओमप्रकाश नौटियाल

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कल्पना मनोरमा

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कल्पना रामानी

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उमाप्रसाद लोधी

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गिरिमोहन गुरु

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गीता पंडित

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मधु शुक्ला

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निशा कोठारी

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पंकज परिमल

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प्रदीप पुष्पेन्द्र

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प्रदीप शुक्ला

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मंजुलता श्रीवास्तव

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रंजना गुप्ता

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रविशंकर पांडेय

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शशि पाधा

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शशि पुरवार

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शिवानंद सहयोगी

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सीमा अग्रवाल

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सुभाष वसिष्ठ

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सुरेन्द्रपाल वैद्य

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सुरेश चौधरी

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सौरभ पांडेय

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यायावर

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योगेन्द्र कुमार मौर्य

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छंदमुक्त में-

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मधु संधु

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मंजुल भटनागर

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त्रिलोचना कौर

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दोहों में-

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ज्योतिर्मयी पंत

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परमजीत कौर रीत

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मंजु गुप्ता

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मधु प्रधान

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अंजुमन में-

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शरद तैलंग

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संपादन¸ कलाशिल्प एवं परिवर्धन : पूर्णिमा वर्मन

सहयोग :
कल्पना रामानी