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अपनी धरती

अपनी धरती के साथ रहता हूँ
इसके सब धूप-ताप सहता हूँ

पूस जैसा कभी ठिठुरता हूँ
और कभी जेठ जैसा दहता हूँ

सब परिंदों के साथ उड़ता हूँ
सारी नदियों के साथ बहता हूँ

जागता हूँ सुबह को सूरज सा
शाम को खण्डहर सा ढहता हूँ

इसमें तुम भी हो और ज़माना भी
यूँ तो मैं अपनी बात कहता हूँ

अगस्त २०१०

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