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उजाले तीरगी में
जी रहे हैं लोग
भले ही रोशनी कम हो

अंजुमन में—
अँधेरे इस क़दर हावी है
इसलिए कि
किसी का डर नहीं रहा
डर मुझे भी लगा
जिन्हें अच्छा नहीं लगता
ज़ुबां पर फूल होते है
तूफ़ानों की हिम्मत
थोड़ी मस्ती थोड़ा ईमान
नहीं होती
फूलों का परिवार
बढ़े चलिये
बड़े भाई के घर से
भले ही उम्र भर
मुझको पत्थर अगर
ये तो है कि
विचारों पर सियासी रंग
शिकायत ये कि
संसद में बिल
सभी तय कर रहे हैं

हमारे हमसफ़र भी
हमारी चेतना पर

 

संसद में बिल

संसद में बिल तो पारित हो जाते हैं,
फिर जाने कानून कहाँ खो जाते हैं।

बस्ती जंगल हो जाती है शाम ढले,
राहनुमा तो खा पीकर सो जाते हैं।

किसके मन में क्या है कुछ मालूम नहीं,
लोग नमस्ते करके चुप हो जाते हैं।

मैं लोगों की बातें क्या सुन लेता हूँ,
सारे झगड़े मेरे सर हो जाते हैं।

अब मंज़िल की राह दिखाने वाले ही,
अक्सर पथ में काटें भी बो जाते हैं।

पूजा-पाठ हमारे वश की बात नहीं,
जाने को हम मंदिर तक तो जाते हैं

६ जुलाई २००९

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