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नई रचनाओं में-
भीड़ का हिस्सा रहा तब
लम्हे-लम्हे पर

सब सियासी चाल हैं
साज़िश फँसकर रह जाएगी
सूरज भी मेरी गोद में

छंदमुक्त में-
अतीत
क्रिकेट का हवाओं के साथ खिलवाड़
स्वस्थ धुओं का सुख

अंजुमन में-
दिल्लगी
पत्थरों सा दिल
बिखरे हैं जो कचरे

मेरे गीतों में

  अतीत

उठो अतीत!
आरामगाह से बाहर आओ!
अब त्याग दो निद्रा
मैं तुम्हें कुछ पल की
मोहलत देता हूँ,
अंगड़ाइयों से बाहर निकल
तैनात हो जाओ
मेरा मार्गदर्शन के लिए
मैं यहाँ व्यग्र बैठा
तुम्हारी दुर्गम-दुर्भेद्य राहों पर
बेखटक दौड़ना चाहता हूँ,
मिलना-जुलना चाहता हूँ--
विहारों, चैत्यों, समितियों
सम्मेलनों, समर-क्षेत्रों
सल्तनतों और मंत्रणा कक्षों में
तुम्हारे साथ जी रहे--
भिक्षुओं, गुरुकुलीय राजकुंवरों
विषकन्याओं, राजगुरुओं
वानप्रस्थी महाराजाओं, सम्राटों
सुल्तानों, बादशाहों
वायसरायों, गवर्नर जनरलों से
मेरी स्मृति-सरिता में
नौका-विहार करते तुम्हारे लोगों से
मिल-बैठकर गप-शप करते हुए
मैं अपने जीवन से बाहर के
अनुभव बिन-बटोर लूँगा,
घुस जाऊँगा अपने पुरखों की उम्र में
और चुरा लाऊँगा--
उनकी उपलब्धियों के दस्तावेज़,
उन्हें नत्थी कर दूँगा
अपनी विफलताओं कि फाइल में
चुनिन्दा उपलब्धियों के रूप में
आओ, मित्र!
मेरे ख्यालों के गुदगुदेदार फर्श पर
अपने लोगों के साथ,
मैं उन्हें तंग नहीं करूँगा
इस अशिष्ट दुनिया कि
खुरदरी जमीं पर बुलाकर
और नहीं कहूँगा कि--
वे तुम्हें निचाट में छोड़
ढेरों बातें करें
मेरा मन बहलाएँ


२४ सितंबर २०१२

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