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अनुभूति में राजेंद्र पासवान "घायल" की रचनाएँ—

नई रचनाएँ—
आपसे कुछ कहें
कभी बादल कभी बिजली
कुछ न करते बना
दर्द बनकर आईना
दिया है दर्द जो तूने


अंजुमन में—
आँखों से जाने उसने क्या
आदमी की भीड़ मे
आदमी को और भला

उदासी के समंदर को
उसके सीने मे
कभी जो बंद कीं आँखें
किसी भी बात से
गया कोई
चाँदनी को क्या हुआ
जब से दिलों का फ़ासला
ज़मीं से आसमानों तक
जो पत्थर काटकर
जो पत्थर तुमने मारा था मुझे
दिल की सदा
दुखों के दिन
दूर तक जिसकी नज़र
धूप राहों में
पता नही
पहलू में उनके
पेड़ पौधा झील झरना
मुझको किनारा मिल गया
मुद्दत के बाद
मेरे मालिक
मेरे लिए
यह सुना है
यादों ने आज
वफ़ा का गीत
वो इंसां भी
सितम जिसने किया मुझ पर
सुनामी के प्रति
हम बिखर भी गए
हर सितम हर ज़ुल्म

संकलन में-
शुभ दीपावली- वहीं पे दीप जलेगा

 

दर्द बनकर आईना

दर्द बनकर आईना क्या-क्या दिखा देगा मुझे
था पता मुझको नहीं क्या-क्या बना देगा मुझे

ख़्वाब में भी जो हक़ीक़त की तरह लगता रहा
आज लगता है मगर वो भी भुला देगा मुझे

दुख सताता है मुझे कितना सताएगा भला
एक दिन आख़िर थकेगा तो दुआ देगा मुझे

सुख में जो मैंने गुज़ारे चार दिन तो यों लगा
बेवफ़ा तो बेवफ़ा है यह दग़ा देगा मुझे

आँख में आँसू किसी की देखना मुमकिन नहीं
आँख भर जो देख लेगा तो रुला देगा मुझे

जिसने शीशे की तरह 'घायल' मुझे बिखरा दिया
फिर भी लगता है कि वो फिर से सजा देगा मुझे

२४ मार्च २००८


 

 

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