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राजेंद्र पासवान "घायल"

'घायल' राजभाषा सेल, भारतीय रिज़र्व बैंक, पटना में मैनेजर हैं। आपकी ग़ज़लें अनेक पत्र पत्रिकाओं में प्रकाशित हो चुकी हैं। ऑल इंडिया रेडियो- मुंबई, विविध भारती और ऑल इंडिया रेडियो पटना से समय-समय पर आपकी रचनाएँ प्रसारित होती रही हैं।
प्रकाशन : 'लपटों के दरमियाँ' नामक ग़ज़लों का संग्रह प्रकाशित।
ई मेल :
rpghayal@rbi.org.in

   

 

अनुभूति में राजेंद्र पासवान "घायल" की रचनाएँ—

नई रचनाएँ—
आपसे कुछ कहें
कभी बादल कभी बिजली
कुछ न करते बना
दर्द बनकर आईना
दिया है दर्द जो तूने


अंजुमन में—
आँखों से जाने उसने क्या
आदमी की भीड़ मे
आदमी को और भला

उदासी के समंदर को
उसके सीने मे
कभी जो बंद कीं आँखें
किसी भी बात से
गया कोई
चाँदनी को क्या हुआ
जब से दिलों का फ़ासला
ज़मीं से आसमानों तक
जो पत्थर काटकर
जो पत्थर तुमने मारा था मुझे
दिल की सदा
दुखों के दिन
दूर तक जिसकी नज़र
धूप राहों में
पता नही
पहलू में उनके
पेड़ पौधा झील झरना
मुझको किनारा मिल गया
मुद्दत के बाद
मेरे मालिक
मेरे लिए
यह सुना है
यादों ने आज
वफ़ा का गीत
वो इंसां भी
सितम जिसने किया मुझ पर
सुनामी के प्रति
हम बिखर भी गए
हर सितम हर ज़ुल्म

संकलन में-
शुभ दीपावली- वहीं पे दीप जलेगा

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