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अनुभूति में राजेंद्र पासवान "घायल" की रचनाएँ—

नई रचनाएँ—
आपसे कुछ कहें
कभी बादल कभी बिजली
कुछ न करते बना
दर्द बनकर आईना
दिया है दर्द जो तूने


अंजुमन में—
आँखों से जाने उसने क्या
आदमी की भीड़ मे
आदमी को और भला

उदासी के समंदर को
उसके सीने मे
कभी जो बंद कीं आँखें
किसी भी बात से
गया कोई
चाँदनी को क्या हुआ
जब से दिलों का फ़ासला
ज़मीं से आसमानों तक
जो पत्थर काटकर
जो पत्थर तुमने मारा था मुझे
दिल की सदा
दुखों के दिन
दूर तक जिसकी नज़र
धूप राहों में
पता नही
पहलू में उनके
पेड़ पौधा झील झरना
मुझको किनारा मिल गया
मुद्दत के बाद
मेरे मालिक
मेरे लिए
यह सुना है
यादों ने आज
वफ़ा का गीत
वो इंसां भी
सितम जिसने किया मुझ पर
सुनामी के प्रति
हम बिखर भी गए
हर सितम हर ज़ुल्म

संकलन में-
शुभ दीपावली- वहीं पे दीप जलेगा

  मुझको किनारा मिल गया

उसने जो चाहा था मुझे इस ख़ामुशी के बीच
मुझको किनारा मिल गया उस बेखुदी के बीच

घर में लगी जो आग तो लपटों के दरमियां
मुझको उजाला मिल गया उस तीरगी के बीच

उसकी निगाहेनाज़ को समझा तो यों लगा
कलियाँ हज़ार खिल गईं उस बेबसी के बीच

मेरे हजा़र ग़म जो थे उसके भी इसलिए
उसने हँसाकर हँस दिया उस नाखुशी के बीच

मेरी वफ़ा की राह में उँगली जो उठ गई
दूरी दीवार बन गई इस ज़िंदगी के बीच

दुनिया खफ़ा है आज भी 'घायल' तो क्या हुआ
उसका ही रंगो नूर है इस शायरी के बीच

1 जून 2007

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अनुभूति व्यक्तिगत अभिरुचि की अव्यवसायिक साहित्यिक पत्रिका है। इस में प्रकाशित सभी रचनाओं के सर्वाधिकार संबंधित लेखकों अथवा प्रकाशकों के पास सुरक्षित हैं। लेखक अथवा प्रकाशक की लिखित स्वीकृति के बिना इनके किसी भी अंश के पुनर्प्रकाशन की अनुमति नहीं है। यह पत्रिका प्रत्येक माह की 1–9 –16 तथा 24 तारीख को परिवर्धित होती है।

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