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अनुभूति में राजेंद्र पासवान "घायल" की रचनाएँ—

नई रचनाएँ—
आपसे कुछ कहें
कभी बादल कभी बिजली
कुछ न करते बना
दर्द बनकर आईना
दिया है दर्द जो तूने


अंजुमन में—
आँखों से जाने उसने क्या
आदमी की भीड़ मे
आदमी को और भला

उदासी के समंदर को
उसके सीने मे
कभी जो बंद कीं आँखें
किसी भी बात से
गया कोई
चाँदनी को क्या हुआ
जब से दिलों का फ़ासला
ज़मीं से आसमानों तक
जो पत्थर काटकर
जो पत्थर तुमने मारा था मुझे
दिल की सदा
दुखों के दिन
दूर तक जिसकी नज़र
धूप राहों में
पता नही
पहलू में उनके
पेड़ पौधा झील झरना
मुझको किनारा मिल गया
मुद्दत के बाद
मेरे मालिक
मेरे लिए
यह सुना है
यादों ने आज
वफ़ा का गीत
वो इंसां भी
सितम जिसने किया मुझ पर
सुनामी के प्रति
हम बिखर भी गए
हर सितम हर ज़ुल्म

संकलन में-
शुभ दीपावली- वहीं पे दीप जलेगा

 

सुनामी के प्रति

धरती ने ली अँगड़ाई तो मौसम बदल गया
निकली जो इसकी आह तो पत्थर पिघल गया

कुदरत ने क्या कहा कि समंदर उबल पड़ा
किसका कुसूर था मगर किसको निगल गया

जो लोग खाते थे कभी मेहनत की रोटियाँ
मुट्ठी से उनकी अन्न का दाना फिसल गया

उस रोज़ की आबोहवा आफ़त से कम न थी
मौजों का ढंग देखकर कलेजा दहल गया

पानी पहाड़ बनके जो दौड़ा तो क्या हुआ
बस्ती तबाह हो गई आँगन कुचल गया

उस दिन सहारा बन गईं पेड़ों की फुनगियाँ
जलजला आया मगर आकर निकल गया

'घायल' मुनासिब है नहीं सागर को छेड़ना
छेड़ा गया तो माजरा पल में बदल गया

16 फरवरी 2006

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अनुभूति व्यक्तिगत अभिरुचि की अव्यवसायिक साहित्यिक पत्रिका है। इस में प्रकाशित सभी रचनाओं के सर्वाधिकार संबंधित लेखकों अथवा प्रकाशकों के पास सुरक्षित हैं। लेखक अथवा प्रकाशक की लिखित स्वीकृति के बिना इनके किसी भी अंश के पुनर्प्रकाशन की अनुमति नहीं है। यह पत्रिका प्रत्येक माह की 1–9 –16 तथा 24 तारीख को परिवर्धित होती है।

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