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अनुभूति में विनोद तिवारी की रचनाएँ-

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कुछ इस क़दर
चलते जाने का धर्म
ज़मीन पाँव तले
सड़कें भरीं

हर दिशा में

अंजुमन में-
आपस में लड़कर
काल की तेज़ धारा
देखे दुनिया जहान
पल निकल जाएँगे

 

चलते जाने का धर्म

चलते जाने का धर्म हैं सड़कें
जी हाँ, जीवन का मर्म हैं सड़कें

सूने बाज़ार से गु़ज़रती हैं
आजकल ख़ूब गर्म हैं सड़कें

तुम सियासत से हट के देखो तो
चीख़ती,शर्म-शर्म हैं सड़कें

जब उजाला था कर्म थीं श्रम का
रात आई, कुकर्म हैं सड़कें

शहरों में सख़्त-जान पत्थर हैं
गावों में मोम नर्म हैं सड़कें

२८ फरवरी २०११

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अनुभूति व्यक्तिगत अभिरुचि की अव्यवसायिक साहित्यिक पत्रिका है। इसमें प्रकाशित सभी रचनाओं के सर्वाधिकार संबंधित लेखकों अथवा प्रकाशकों के पास सुरक्षित हैं। लेखक अथवा प्रकाशक की लिखित स्वीकृति के बिना इनके किसी भी अंश के पुनर्प्रकाशन की अनुमति नहीं है। यह पत्रिका प्रत्येक सोमवार को परिवर्धित होती है

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