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पहली बारिश

मुरली की तान पे बौराई राधे की तरह
खिंची चली आई हूँ
बारिश तेरी आहट पे।
तेरे बूँदों की थपकियों पर थिरकता मन
जाने कितने जज़्बों को 'हरा' कर लाया है।
जैसे एक-एक बूँदें तेरी
ज़मीं को सहलाती हैं
एक-एक किस्से-कविताएँ
जो बंद थी भीतर
फूट जाती हैं।
तेरे बरसते ही
जी करता हैं मैं भी बरसूँ
भेद कुढ़न का वायुमंडल
बिजली-सी चमकूँ!
हवाओं में रच जाऊँ
धूल संग बह जाऊँ
धो डालूँ हर तपिश
गगन भेद गूँजूँ।
बारिश तेरी फुहार जब जब गुदगुदाती है
मैं जी उठती हूँ
मेरी आत्मा सिंच जाती है।

९ अगस्त २००३

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