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नई रचनाओं में-
अपनी मुहब्बत बनी रहे
क्या अजब दुनिया
क्या हुआ उपवन में
तू भूख, प्यास, जुल्म
सवाल काग़ज़ पर

अंजुमन में-
दावानल सोया है कोई
बदल गए हैं यहाँ
वेदना को शब्द
स्याह रातों में
हमको सोने की कलम

दोहे-
आएगी माँ आएगी
गर्व करें किस पर
प्रश्नोत्तर चलते रहे

छंदमुक्त में-
आस न छोड़ो
कविता भर ज़मीन
धीरज
पूजा
योगफल
शब्द
शोभा यात्रा
सड़क
सेल

 

  धीरज

धीरज
अब जिहाद पर उतारू है

पसरा है अकाल
मगर सरपंच की ज़मीन पर
चल रहा है पंपसेट
लहलहा रहे हैं खेत

कर्ज़ में डूबा किसान
आत्महत्या के विचार को
झटक रहा है बार-बार

छोटे सरकार
(याने सरपंच के बरखुरदार)
भेजकर हवलदार
बुलवाते हैं हवेली में
किसनवा की लाड़ली
रात भर के लिए
और उसके मना करने पर
चला देते हैं मस्ती में
उसकी कनपटी पर पिस्तौल
पटाक्

सरपंच और सेठ
मिलीभगत से
बना रहे हैं
गाँव की विकास योजनाएँ
सड़कें पुल तालाब कुएँ

सरकारी अफ़सर
दलालों की तरह
खोज रहे हैं इनमें
सेंध मारने के लिए
कमज़ोर हिस्से

दूर खेत की मेड़ पर
बैठे हैं
गाँव के छोकरे
असहमति की भट्टी में
ढाल रहे हैं पिस्तौलें और चाकू
बना रहे हैं
आक्रोश के हथगोले
भर रहे हैं उनमें
विद्रोह की जिलेटिनें

गाँव के बड़े-बूढ़े
अपनी
काँपती हथेलियों के बीच
बचा रहे हैं
नन्हें दीये को जैसे–तैसे
शातिर हवा से

और गाँव की औरतें
अपनी देह की ताप से
सेंक रही हैं
नई उम्मीदों के लिए रोटियाँ
छोरियाँ गा रही हैं
मुक्ति के गीत

एक बड़ी लड़ाई के लिए
कसमसा रहा है
गाँव का धीरज

१६ जुलाई २००७

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