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रेगिस्तान

चाहे रेगिस्तान हो चाहे पथरीले पहाड़
हरियाली फूटकर बाहर आ जाती है यहाँ से भी
जैसे वे आत्मा के रंग ही हों
थोड़े-थोड़े हरे रंग भरे हुए यहाँ
जिन्हें कभी ओस नसीब नहीं होगी
न ही कभी बारिश।
फिर भी ये धीरे-धीरे बढ़ते रहेंगे
चमकते रहेंगे हमारी आँखों में समाकर।
जीवन एक से निकलता है
समा जाता है दूसरे में
यहाँ सुनसान-सी दुनिया
रेत में भी रेत के कण उड़ते हुए
थोड़े से लोग मौजूद
बाज़ार से ऐतिहासिक चीज़ें ख़रीदते हुए
यहाँ के बाज़ार कभी नहीं बदलेंगे
वे छोटी-छोटी चीज़ें ही हमेशा बेचेंगे
और मेरे हाथों में जो तस्वीर हैं
इन पुराने अवशेषों की
यह इतिहास का एक पन्ना है
जिसे काग़ज़ में सुरक्षित
ले जा रहा हूँ वापस मैं घर।

24 फरवरी 2007

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