अंजुमन। उपहार। काव्य संगम। गीत। गौरव ग्राम। गौरवग्रंथ। दोहे। पुराने अंक संकलन। अभिव्यक्ति। कुण्डलिया। हाइकु। हास्य व्यंग्य। क्षणिकाएँ। दिशांतर

अनुभूति में पंकज त्रिवेदी की रचनाएँ—

नई रचनाओं में-
मैं और मत्स्य कन्या (पाँच कविताएँ)

छंदमुक्त में—
अनमोल मोती
झुग्गियाँ
तृषा
दस्तक
नसीहत
निःशब्द
नीम का पेड़
पता ही न चला
पूरा आकाश जैसे
बचपन
बातें
मन या शरीर
सड़क के बीच
सवाल
सुख
हरा आँगन

हरा आँगन

कल तक
मुरझाये हुए थे वे
बंद देहरी के आँगन में
यहाँ-वहाँ दौड़ते सूखे पत्ते
इकट्ठे होकर एक कोने में
सयाने बच्चों की तरह बैठ गए है

कुएँ में बंधा
स्थिर जल सिवार और बेल से
ढका हुआ
आज नीले आकाश को प्रतिबिंबित
करता है तुम्हारे चहरे की तरह !

मकडी के जाल से सराबोर
तुलसी क्यारे में खड़ी सूखी शाखाओं के
शिखर पर
इकलौता हरा पर्ण
आँगन को सुगंधित करने
समर्पित हो रहा है

कोने में आज भी
तुम्हारे हाथों से बोया वो
गुलाब का पौधा
पवन की लहर के साथ
नर्तन कर रहा है,

माँ के बिना यह घर
बिलकुल सूना था
जो, तुम्हारे आने से
सज रहा है नया रूप

माँ कहती थी -
मेरी बहु सगुनवाली होगी
आते ही इस घर को
हराभरा कर देगी

माँ तुम्हें देख रही है
हे प्रिये... !

२९ नवंबर २०१०

इस रचना पर अपने विचार लिखें    दूसरों के विचार पढ़ें 

अंजुमन। उपहार। काव्य चर्चा। काव्य संगम। किशोर कोना। गौरव ग्राम। गौरवग्रंथ। दोहे। रचनाएँ भेजें
नई हवा। पाठकनामा। पुराने अंक। संकलन। हाइकु। हास्य व्यंग्य। क्षणिकाएँ। दिशांतर। समस्यापूर्ति

© सर्वाधिकार सुरक्षित
अनुभूति व्यक्तिगत अभिरुचि की अव्यवसायिक साहित्यिक पत्रिका है। इसमें प्रकाशित सभी रचनाओं के सर्वाधिकार संबंधित लेखकों अथवा प्रकाशकों के पास सुरक्षित हैं। लेखक अथवा प्रकाशक की लिखित स्वीकृति के बिना इनके किसी भी अंश के पुनर्प्रकाशन की अनुमति नहीं है। यह पत्रिका प्रत्येक सोमवार को परिवर्धित होती है

hit counter