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मन या शरीर
सड़क के बीच
सवाल
सुख
हरा आँगन

सवाल

ये मन की गहराई की
तह को तलाशने की मंशा...!
ये मन ढूँढता हैं तुम्हें
तो पहुँचता हैं
कोसों दूर...
जहाँ कंकाल सी स्मृतियाँ
आज भी मेरे कदमों की आहट से
अंग मरोड़कर खड़ी हो जाती हैं..

तुम्हारा बिछड़कर लुप्त हो जाना और जैसे
सदियों से दफ़न हुए उन सपनों को
फिर से जगाना
दुनिया की पैनी नज़रों से
छल्ली होता हुआ वो प्यार
आज भी नज़र आता हैं...

प्यार का दूसरा नाम ही दर्द है...
फिर भी क्यों तरसते-भड़कते हैं लोग?
प्यार करना तो माँ ने अपने गर्भ से सिखाया था
प्यार की परिभाषा के बोझ तले दबा हुआ आदमी
कब समझेगा प्यार और अहसास को...

दफ़न हो सकता हैं प्यार?
कईं सवालों के बीच में
प्यार की अडिगता को भी आकलन करने को
मति की दौड़ क्यों लगाते हैं..?

२० फरवरी २०१२

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