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अनुभूति में प्रदीप कांत की रचनाएँ -

नये गीतों में-
उठो जमूरे

ठसक वही की वही रही
मौन विदुर से

गीतों में-
क्या लिखते हो
काशी के हम पण्डे जी
ख्वाब वक्त ने जिनके कुतरे
छेदों वाला पाल बुना रे

लिक्खें किसको अब चिट्ठी

अंजुमन में-
इतना क्यों बेकल
खुशी भले पैताने रखना
थोड़े अपने हिस्से
धूप खड़ी दरवाज़े

छंदमुक्त में-
आजकल
कितने ही राम
कैसे
चिड़िया और कविता
चिड़िया की पलकों में
दीवारें
बचपन
मित्र के जन्म दिन पर
यों ही
विश्वास
शब्द पक रहे हैं

 

मौन विदुर से

बैठे हम भी मौन विदुर से
सूने पड़े हुए मन्दिर से
कौन बुहारे हमको फिर से

बिन तुलसी के ज्यों आँगन
खाली गल्ले जैसे मन
बीत रहे बस, रीत रहे
कौन भरे अब इनको फिर से

ठिये निठल्लों के बन बैठे
गुलशन सूखे, कैसे ऐंठें
नहीं दूर तक बादल कोई
मोर आस का कैसे थिरके

ये अन्धा तो वो बहरा है
सन्नाटा फैला गहरा है
अपने प्रण को पकड़े भीष्म
बैठे हम भी मौन विदुर से

धुँधली पड़ीं ऋचाएँ कुछ
राग विलम्बित गाएँ कुछ
ताल समय की लेकिन द्रुत
पकड़े किसको कौन किधर से  

२३ फरवरी २०१५

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