अंजुमन। उपहार। काव्य संगम। गीत। गौरव ग्राम। गौरवग्रंथ। दोहे। पुराने अंक संकलन। अभिव्यक्ति। कुण्डलिया। हाइकु। हास्य व्यंग्य। क्षणिकाएँ। दिशांतर

अनुभूति में प्रताप नारायण सिंह  की रचनाएँ-

लंबी रचना-
रौद्र रूद्र

छंद मुक्त में-
अभिशप्त
एक पल में स्वप्न
कब तक फिरोगे भटकते
जीवन की किताब
तुम्हारी प्रतीक्षा में
बस इतना ही करना
बदलाव
 

  जीवन की किताब

मेरे जीवन की किताब से जाने कब
प्यार का पन्ना फट कर निकल गया था
जब से होश सँभाला
उसे तलाशता रहा यहाँ वहाँ
भटकता रहा उसकी खोज में गलियों और कूचों में
ढूँढ़ता रहा उसे विभिन्न आकृतियों में
बौराया फिरता रहा हर पल
पर वह नही मिला
मैं हार बैठा
समझा लिया मन को
फिर एक दिन
कुछ जानी पहचानी शक्लों वाले
शब्दों ने आवाज़ दी
पास गया तो पाया कि
ये मेरे ही गुम हुए पन्ने के शब्द हैं
मैं एक पल खुश हुआ, बहुत खुश
दूसरे पल उदास हो गया
वह पन्ना अब एक किताब बन चुका था
कैसे जोड़ पाऊँगा उसे फिर
अपने जीवन की किताब से?

२ फरवरी २००९

इस रचना पर अपने विचार लिखें    दूसरों के विचार पढ़ें 

अंजुमन। उपहार। काव्य चर्चा। काव्य संगम। किशोर कोना। गौरव ग्राम। गौरवग्रंथ। दोहे। रचनाएँ भेजें
नई हवा। पाठकनामा। पुराने अंक। संकलन। हाइकु। हास्य व्यंग्य। क्षणिकाएँ। दिशांतर। समस्यापूर्ति

© सर्वाधिकार सुरक्षित
अनुभूति व्यक्तिगत अभिरुचि की अव्यवसायिक साहित्यिक पत्रिका है। इसमें प्रकाशित सभी रचनाओं के सर्वाधिकार संबंधित लेखकों अथवा प्रकाशकों के पास सुरक्षित हैं। लेखक अथवा प्रकाशक की लिखित स्वीकृति के बिना इनके किसी भी अंश के पुनर्प्रकाशन की अनुमति नहीं है। यह पत्रिका प्रत्येक सोमवार को परिवर्धित होती है

hit counter