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अनुभूति में प्रताप नारायण सिंह  की रचनाएँ-

लंबी रचना-
रौद्र रूद्र

छंद मुक्त में-
अभिशप्त
एक पल में स्वप्न
कब तक फिरोगे भटकते
जीवन की किताब
तुम्हारी प्रतीक्षा में
बस इतना ही करना
बदलाव
 

  तुम्हारी प्रतीक्षा में

तुम्हारी प्रतीक्षा में,
रोज़ अपने घर को बुहारता हूँ,
सजाता हूँ पल्लव और पुष्पों से,
रास्ते में पड़े काँटों को चुनता हूँ,
पिरोता हूँ बहुरंगी फूलों को माला में,
वीणा के तारों को कसता हूँ,
सजाता हूँ अपने गीतों के बोलों को,
बार-बार देहरी तक देख आता हूँ,
पर तुम नही आते।

सूरज चढ़ जाता है आसमान में ऊपर,
पुष्प कुम्हलाने लगते हैं,
रास्ते में सूखे पत्ते और काटें भरने लगते हैं,
वीणा के तार ढीले पड़ने लगते हैं,
पर तुम नहीं आते।

सूरज छिपने लगता है दूर पहाड़ियों के पीछे,
रास्ते पर धूल का गुबार उठने लगता है,
फूल मुरझा जाते हैं,
वीणा के तार शिथिल हो जाते हैं,
मेरी आँखें डबडबा जाती हैं,
पर तुम नही आते।

रात की स्याही से मेरा आँगन भर जाता है,
आसमान में तारे टिमटिमाते हैं,
दूर कहीं पद-चाप सुनता हूँ-
सोचता हूँ तुम राह में हो-
और फिर तैयारी करने लगता हूँ,
नए दिन के प्रतीक्षा की।

२ फरवरी २००९

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