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कि तुम बड़े हो
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छंदमुक्त में-
जिन्दा हो
बाजार
बेटी
भीतर कोई है
सुबह खुल रही है फिर से
सुरक्षा

 

कि तुन बड़े हो

खोकर अपना स्व,
गँवाकर सबकुछ अपना
वैभव के जिस निजी शिखर पर
खड़े हुए हो निपट अकेले
खोखली मुस्कराहटों
गंधियाते मन
सत्ता के उच्छिष्ट की असह्य दुर्गंध
नाक आँख सब बंद किए
तुम इसी भ्रम में अड़े खड़े हो
कि तुम बड़े हो

३० जनवरी २०१२

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