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ज़िन्दा हो

तुम ज़िन्दा हो
अगर ज़ुल्म देखकर
धधक उठती है तुम्हारी आँखें
रगों को फाडकर
बहार निकलने को मचलता है लहू
तुम सुन्दर हो
अगर लगातार जूझने के निशानो से
सजा हुआ है तुम्हारा जिस्म
अगर तुम्हारे पास है
मार खाकर भी
न हारने का मिज़ाज
रूटीन को तोडने का हौसला
अगर
तेज़ धार के बीच
तुम खडे रह सकते हो-बेखौफ़
नदी का रुख मोडने के अज़्म के साथ
अगर ज़ुल्म से टकराने को
उठते है तुम्हारे हाथ
तो वाकई
तुम ज़िन्दा हो

५ सितंबर २०११

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