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सिफ़र का सफ़र

 

दिन रात

मेहनत जो करते दिन-रात
वो दुख में रहते दिन-रात

सुख देते सबको निज-श्रम से
तिल-तिल कर मरते दिन-रात

मिले पथिक को छाया हरदम
पेड़, धूप सहते दिन-रात

बाहर से भी अधिक शोर क्यों
भीतर में सुनते दिन-रात

दूजे की चर्चा में अक्सर
अपनी ही कहते दिन-रात

हृदय वही परिभाषित होता
प्रेम जहाँ बसते दिन-रात

मगर चमन का हाल तो देखो
सुमन यहाँ जलते दिन-रात 

१६ अप्रैल २०१२

 

 

 
 

 

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