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अभिव्यक्ति में विजय कुमार श्रीवास्तव 'विकल' की रचनाएँ

जीवन की साध
परिवर्तन
मधुहीन आज यौवन प्याला
मानवता की द्रौपदी
मुझे दिन में भी अंधेरा दीखता है
रात की दुल्हन
सात क्षणिकाएँ
हृदय वीणा को न जाने कौन झंकृत कर रहा है
 

  जीवन की साध

अपने प्राणों की अर्थी पर
प्रियतम का प्यार सजाना
मेरे जीवन की साध यही
बस भावों में ही खो जाना
स्वप्न जगत में उनका मिलना
जितना सुखकर होता
मिलने पर वह सुख जाने क्यों वह सुख
खंड-खंड हो जाता
मेरे वण रंध्र में प्रिय की
पिक वाणी जब पड़ती
अंतस्तल के बधुबन में
मधुमयी गागरी सजती
उनके संकेतों पर मेरे
मन का सरगम बजता
उनके पद चापों को सुन कर
हृदय अंबु निधि बढ़ता
अपने नील निलय में जब
वह मुझको कभी बुलाते
पुलक शरीर रोम अति पुलकित
नयन पलक झंप जाते
मेरा प्रियतम मुझ में होता
मैं होता प्रियतम में
यह अभिलाष अनल बन जलती
निश दिन मेरे मन में
मेरे भाव जगत से प्यारे
चले कभी जो जाते
मेरा जीवन दूभर होता
मणि बिनु फणि जिम कारे
तेरा सुखद स्पर्श मेरे
तन का परिताप मिटाता
तेरा मृदुल हास्य मेरे
मन का संताप मिटाता

24 फरवरी 2007

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