अंजुमन। उपहार। काव्य संगम। गीत। गौरव ग्राम। गौरवग्रंथ। दोहे। पुराने अंक संकलन। अभिव्यक्ति। कुण्डलिया। हाइकु। हास्य व्यंग्य। क्षणिकाएँ। दिशांतर

अभिव्यक्ति में विजय कुमार श्रीवास्तव 'विकल' की रचनाएँ

जीवन की साध
परिवर्तन
मधुहीन आज यौवन प्याला
मानवता की द्रौपदी
मुझे दिन में भी अंधेरा दीखता है
रात की दुल्हन
सात क्षणिकाएँ
हृदय वीणा को न जाने कौन झंकृत कर रहा है
 

 

परिवर्तन

संसृति में होते परिवर्तन
परिवर्तन ही शाश्वत सत है
यदि रुका कहीं जो परिवर्तन
तो महा प्रलय ही निश्चित है
प्रतिदिन हम अपनी ही आँखों
यह अभिनय देखा करते हैं
दिन रजनी के नव पर्दे पर
दिनकर शशि क्रीड़ा करते हैं
जिनके जीवन में केवल सुख
दुख की घड़ियाँ भी आती हैं
सुख दुख के दो उपकूलों से
जीवन सारि बहती जाती है
चिर मधुराधर की स्निग्ध हँसी
क्षण में विलीन हो जाती है
ग्रीष्म ऋतु की सूखी सरिता
पावस ऋतु में बल खाती है
अपने यौवन की छवि पर जो
लीला इतराती रहती है
दो दिन भी बीत न पाते जब
छलना छवि हर ले जाती है।

24 फरवरी 2007

इस रचना पर अपने विचार लिखें    दूसरों के विचार पढ़ें 

अंजुमन। उपहार। काव्य चर्चा। काव्य संगम। किशोर कोना। गौरव ग्राम। गौरवग्रंथ। दोहे। रचनाएँ भेजें
नई हवा। पाठकनामा। पुराने अंक। संकलन। हाइकु। हास्य व्यंग्य। क्षणिकाएँ। दिशांतर। समस्यापूर्ति

© सर्वाधिकार सुरक्षित
अनुभूति व्यक्तिगत अभिरुचि की अव्यवसायिक साहित्यिक पत्रिका है। इसमें प्रकाशित सभी रचनाओं के सर्वाधिकार संबंधित लेखकों अथवा प्रकाशकों के पास सुरक्षित हैं। लेखक अथवा प्रकाशक की लिखित स्वीकृति के बिना इनके किसी भी अंश के पुनर्प्रकाशन की अनुमति नहीं है। यह पत्रिका प्रत्येक सोमवार को परिवर्धित होती है

hit counter