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अभिव्यक्ति में विजय कुमार श्रीवास्तव 'विकल' की रचनाएँ

जीवन की साध
परिवर्तन
मधुहीन आज यौवन प्याला
मानवता की द्रौपदी
मुझे दिन में भी अंधेरा दीखता है
रात की दुल्हन
सात क्षणिकाएँ
हृदय वीणा को न जाने कौन झंकृत कर रहा है

  सात क्षणिकाएँ
1
मन की तरी
भावों के भार से बोझिल
कल्पना सागर में बह चली
और ढूँढ़ते ढूँढ़ते जब
अनुकूलता का बंदरगाह न मिला
तो विकलता के टापू पर जा लगी

2
हृदय का मोम
नर संहार की अग्नि से पिघल
किंकर्तव्यविमूढ़ता के पात्र में पहुँचा
और संस्कारों का बर्फ़ पा पुन: कुंठित हो गया

3
कर्तव्य विद्रोही ने
ईमानदारी की गोली
अन्याय के शावक पर चलाई
राजनीति के अंगरक्षक ने
प्रवंचना के सीने पर रोक लिया

4
परीक्षाओं का शिशिर समाप्त हुआ
अवकाश का बसंत आया
घर आँगन की बगिया में
सफ़ाई के फूल खिल गए।

5
विद्यार्थियों की मछलियाँ
गाड़ी की सरिता में बहती हुई
स्टेशन के सरोवरों में लगीं
तो पिता और प्रेमियों के जाल में छन गईं

6
हृदय के प्याले से
भावों की मदिरा छलकी
लेखनी की तश्तरी ने समेट
काग़ज़ की सुराही में रख दिया
कविता उद्भूत हुई।

7
भावुकता का पागल
चिंतन की रात्रि में जागता रहा
और बेचैनी की करवटें बदलता
अंत में समस्या समाधान का मर्फिया ले सो गया

8
अंत:करण के मानसरोवर में
शुभ्र भावनाओं का राजहंस
आनंद के मोती चुगता हुआ
जीवन की यात्रा को तय कर लिया

9
नाम की सूरत को अख़बार के दर्पण में देखा
उर के सुर मंडप में खुशियों की परी नाच उठी
मन में जो अविकसित थी महत्वाकांक्षाओं की लता
प्रेम पादप के सहारे सुख के शिखरों पर वह जा चढ़ी।

24 मई 2006

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