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अभिव्यक्ति में विजय कुमार श्रीवास्तव 'विकल' की रचनाएँ

जीवन की साध
परिवर्तन
मधुहीन आज यौवन प्याला
मानवता की द्रौपदी
मुझे दिन में भी अंधेरा दीखता है
रात की दुल्हन
सात क्षणिकाएँ
हृदय वीणा को न जाने कौन झंकृत कर रहा है

  मधुहीन आज यौवन प्याला

यम नियमों का निष्ठुर बंधन
इस बंधन में बंध मानव मन
दे कर विवेक का नाम इसे
क्या छलता नहीं स्वयं जीवन
डर रे डर ओ छलने वाला तू है निज जीवन रखवाला

जो वस्तु छिपाई जा न सके
उसको भी ढकना कौन न्याय
जो सुधा पिलाई जा न सके
कल्पित मधु का क्या अभिप्राय
मत ढक तू पिला ओ दिलवाला शीतल कर जीवन की ज्वाला

मृग मद की गंध किसी वन में
कोयल की कूक ग्रीष्म रितु में
है नहीं छिपाए से छिपती
चाँदनी शरद की नभ गृह में
मत छिपा हृदय के रोग भाव हृदय का रोग बढ़ाने वाला

मेरे जीवन के उपवन में
खिल पुष्प बहुत झड़ जाते हैं
मेरे इस मानस सागर में
कितने मोती खो जाते हैं
रख लोना अपने पास इन्हें ओ संचय करने वाला

तुम रह कर मुझसे दूर कहो
कैसे हो दिल को बहलाते
मुझको भी सिखला दोना
वह जिससे हो मुझे भुला पाते
मैं भूल न पाता उसको भी जो मुझे भुलाने वाला

माना समाज से प्यार तुम्हें
पर मैं क्या व्यक्त नहीं इसका
क्या मुझे प्यार की प्यास नहीं
जाओ फल पाओगे इसका
मुझको भी प्यार जगत से है ओ प्यार दिखाने वाला

24 फरवरी 2007

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