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हाँफता हुआ शहर
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क्षणिकाओं में-
विनिमय
काला बाज़ार
उषःपान

हास्य–व्यंग्य में-
नकली
चोर
अपने पराए

संकलन में-
नया साल–अभिनंदन
अभिनंदन २००४

 

तीन व्यंग्य

नकली

नकली
सब नकली।
असली
बस हम असली।

चोर
एक चोर
चर्चा के बीच
टांग अड़ा कर बोला :
‘साला, जमाना ही सारा
चोर है’

अपने–पराये

क्या जानूँ ?
क्या मानूँ ?
क्या पहचानूँ ?
क्या ना जानूँ, ना मानूँ, ना पहचानूँ ?
ओह तुम सब सबसे नीचे
सब थे अपने
पर अब हो पराये।

२४ दिसंबर २००३

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