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अनुभूति में वीरेंद्र जैन की रचनाएँ -

नए गीत-
जाने कितने साल हो गए
देखने को
बनवासों का कोलाहल है
मौत मुझको दे दे मोहलत
ये ही दिन बाकी थे
लिप्साओं ने सारे घर को

गीतों में
अब निर्बंध हुआ

कोई कबीर अभी ज़िंदा है
चाँदी की जूती

अंजुमन में-
किताबें

छंदमुक्त में-
नया घर

हास्य व्यंग्य में-
आमचुनाव में
क्योंजी आप कहाँ चूके?
खूब विचार किए
नाम लिखा दाने दाने पर
बेपेंदी के लोटे
मुस्कान ये अच्छी नहीं
ये उत्सव के फूल
हम चुनाव में हार गए

  किताबें

सकपकाती हैं, न डरती हैं किताबें
डाकियों का काम जब करती किताबें

शब्द के बिन भी कई सन्देश देतीं
सीढ़ियों पर बेवजह गिरती किताबें

थाम लेतीं जब उन्हें नाजुक हथेलीं
संग-संग इठलाई-सी फिरतीं किताबें

छात्र आते और जाते मौसमों से
ज़िन्दगी भर को हुई भरती किताबें

शब्द का साधक समय के पार जाता
देह मरती पर नहीं मरतीं किताबें

२ जून २००८

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