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  दूरी

तुम आकाश की ऊँचाई से
देखते हो हमें
और तुम्हें
चींटीं-सा लगता है
हमारा वजूद।

उतनी ही दूरी से
हम भी
देखते हैं तुम्हें
और तुम हमें
बेचारे, भटके
पंछी से लगते हो।
यह हमारा,
ठोस ज़मीन पर
खड़े होने का
बौना ग़रूर।

इस दूरी को हटा कर
इंसान की तरह
देख सकें,
हम दोनों
एक दूसरे को
ऐसा कोई
बीच का रास्ता
होगा तो ज़रूर।

24 जुलाई 2007

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