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उम्मीद
मोह की डोर से बँधी
उम्मीद की पतंग अंधी
दौड़ती है दूर-दूर तक,
अज्ञान का मांझा
कामनाओं की हवा
कुछ लोभ के झटके
उड़ती है दूर-दूर तक।
खुला आकाश
परिंदों का साथ
एक और गर्व का झटका
बस यह काटा, वह काटा।
फिर पता नहीं कब
घुस-पैठ कर बैठी,
जीवन की शाम।
एकाकी, थकी-हारी,
सब सुनसान।
ज़रा-सा यथार्थ का पानी
उम्मीद भीगी
डोर उलझी,
सह न पाई।
कट कर. बिलख कर
यों गिरी, बेरंग पतंग,
सब धराशायी।
24 जुलाई 2007 |