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अनुभूति में देवी नागरानी की रचनाएँ

नई ग़ज़लों में-
ज़माने से रिश्ता
दोस्तों का है अजब ढब
फिर पहाड़ों से झरना
मुझे भा गई
रियासत जब भी ढहती है

अंजुमन में-
आँधियों के पर
क्या कशिश है
खुशी की हदों के पार
गिरा हूँ मुँह के बल
डर
दिल से दिल तक
दीवार-ओ-दर
बढ़ रही है आजकल
बादे बहार आई
मेरे वतन की ख़ुशबू
रो दिए

सदा धूप में
सीप में मोती

शोर दिल में

कविताओं में-
भारत देश महान

  बादे बहार आई

बादे-बहार आई, ख़ुशबू-ख़ुमार लाई
ख़ुशियों का है ये मौसम, परिवार को बधाई

सूरजमुखी खिली है, खुश रंग हैं फज़ाएँ
बादे-सबा ने कैसी प्यारी ग़ज़ल बनाई

भँवरो की गुनगुनाहट कोयल की कूक प्यारी
उनसे चुराके सरगम, ये धुन मधुर बनाई

चंचल-सी एक तितली चूमे सुमन सुमन को
शरमा के हर कली भी, जाने क्यों मुस्कराई

बरसात भीनी-भीनी उस पर घनी घटाएँ
शबनम की ओस जैसे मन को भिगोने आई

चारों तरफ़ हैं झूमे झोंके हवा के 'देवी'
मदहोश होके जैसे फस्ले-बहार आई

गुलज़ार महके 'देवी' दिल दिल को दे दुआएँ
मंथन किया जो मन का अनुभूति सुख की पाई

२१ जुलाई २००८

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